वेदना

झूम रहा दावानल
मन में अंगार लिये
हिमबर्फ भी पिघली
बंजर में बयार लिये
मुक्त हुई मेघ कलाऐं
छद्म अलंकार लिये
ज्वालाऐं भी बहकी
बुझते अहंकार लिये
हृदय के पुष्प महके
कांटों में प्रहार लिये
वेदनाऐं भी हुई साक्षी
प्रेम का उपहार लिये।

…. कमल जोशी….

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