||पानी के स्वरूप ||

“पानी ही है जीवन सबका
बिन पानी है जग यह सुन
है इसके ही रूप कई
बिन इसके ना मोती,चुन

कभी हया बन जाती है
तो कभी आन बन आती है
सुख-दुःख को करती है बयां
जब आखों बहके आती है ,

बनके दर्द की इंतहा
जब आखों में आता है
थमता है जब शब्दों का सागर
आसुओं का वो शैलाब आता है ,

नस-नस में लोगो के बहता हूँ
कठिन परिश्रम से दीखता हूँ
रहना मेरा आवश्यक है
संग इसीलिए मै हरदम रहता हूँ ,

प्यास बुझाता हूँ जनमानस का
करता हूँ नयी ऊर्जा का संचार
ना मेरे बिना ये जग जीवन है
काश !समझ पाते तुम्हारे विचार ||”

2 Comments

  1. Manjusha Manjusha 29/12/2015
  2. omendra.shukla omendra.shukla 30/12/2015

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