ठंडे पेट गर्म सियासत

वो दुबले है,वो पतले है
कुछ अस्थिहीन -सी शक्लें है
वो नजर बीमार से आ रहे
जैसे-तैसे चल पा रहे
आखों मे नमी,उम्मीद नही
रोटी की आस गयी डूब कही
भूखे सोने की आदत है
पर फिर भी गर्म सियासत है
चुनावी मुद्दा है भूख एक
करते वादे हर बार अनेक
हर बार हर एक पार्टी ने
भूख का मुद्दा उछाला है
भूखों की परवाह नही है ये
विरोधी पर कीचड डाला है
उनकी रसोई का चुल्हा तो
कई रोज से ना जल पाया है
अनाज का एक दाना नही
पानी से काम चलाया है
उनकी आँते तो गयी सकुड
एक रोटी भी ना पचाई है
भूख उनका कोई मुद्दा नही
उस जीवन की सच्चाई है
आलीशान बंगले वालो !
छोडो अब ये हथकंडे
किसी के गमगीन जीवन को
ना बनाओ तुम अपने धंधे
अगर जरा सी मानवता है
तो मिलकर राह बनाओ तुम
पक्ष-विपक्ष की चिंता छोडकर
उन तक रोटी पहुंचाओ तुम।