नववर्ष(2016)

मान,प्रतिष्ठा शान भरा हो
रिश्तो मे ना जहर भरा हो
छू ले हम आसमा को अब के
नया साल उम्मीद भरा हो
विचित्र ,विलक्षण प्रेम अनुभूति
विचलित ना हो सुनकर जनक्ष्रुति
कंटकों पर चले अडिग हम
दशो दिशा मे फैले अब कीर्ति
माता के ममत्व का आंचल
पिता के दुलार का वो प्रांगण
बहन भाइयो का वो झगडा
संबंधो का मधुर दिलाशन
ना जल रहे हो मन ईर्ष्या मे
असहिष्णुता के तेवर दबे हो
कबीर की साखी से निर्मल
रामचरित से बोल सजे हो
प्रतियोगिता ना बने दुश्मनी
ना बीज रहे जातिवाद का
संस्कृति के मूल्य ना दबे
करे आवाहन युवा समाज का
जोश,लगन मेहनत को रोपे
भेदभाव मिटे फूले समभाव
अमीरी-गरीबी का हो सके मेल
गीता वचनों की चले बयार
मिले दर्जा नारी को पुरूष सा
कानून नही मन पावन हो
कपडों से ना आके चरित्र
आखों मे शर्म का सावन हो
खुले विचारो का हो तानाबाना
ना संकीर्ण सोच का साया हो
अतिथियो का देव रूप हो
ना सब कुछ जग मे माया हो
केवट बनकर पार लगाये
क्लेशो से जीवन नइया को
सीता बने नारी चरित्र से
ममता मे सारी अनसूया हो
कूदे दहलीज घर की बेटी
ना इज्जत की चौखट लाँघे
फैला पंखो को उडे गगन मे
ना चरित्र पर पिस्टल दागे
दोस्ती की हो अपनी सीमा
चाहे पुरुष, या नार हो
चले कदम से कदम मिलाकर
ना संस्कार का प्रतिकार हो
नववर्ष पर बदले खुद को
देश तो आज भी अच्छा है
नही मिटी जो मन से बुराई
तब नववर्ष हर्ष तो कच्चा है
ग्रीटिंग कार्ड मँहगे तोहफे
झूठे सुख को ना अपनाए
ये वर्ष देश को दे बुलन्दी
2016 ऐसा आये।