गुनाहों की उम्र

निर्भया एक हाहाकार
आज भी है जीवित
मौसम बन हृदयों में
भय फैला बस्तियों में,
समयकाल बढ़ चला
विचार भी अनेक बहे
विद्वानों की गलियों में
विकारों ने भी छल रचे,
ना कोई इंसान बना
ना कोई इंसाफ मिला
पहचान एक धुंधली थी
तभी धूप पिघली थी,
दुनिया के अधूरेपन में
दम तोड़ रहे संस्कार
हवायें भी सोच रही
दिशा सही या रफ्तार,
सितारों को मिला
शोहरत का हक मुठ्ठी में
नादानों का क्या दोष
सम्मान मिला मिट्टी में,
है विचित्र यह संसार
अमीर गरीब का भेद है
प्यार की उम्र नहीं दिखी
जाने किस किताब ने
गुनाहों की उम्र लिखी।

….. कमल जोशी…..

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