? जुगनु सा चमके जाता हूँ! ?

? जुगनु सा चमके जाता हूँ! ?

मावस की काली रातो में,
जुगनु सा चमके जाता हूँ!
हर अनुभव की मोती माला,
मै हाथ पिरोये जाता हूँ!!
प्रेम भरा विष का प्याला,
मै उसे घोल पी जाता हूँ!!!
मावस की काली रातो में,
मै जुगनु सा चमके जाता हूँ!
विडम्बना के अम्बर पर,
मै पन्छी बन उड जाता हूँ!!
ऑर छीन रोशनी सुरज से,
जग को प्रकाश दे जाता हूँ!!!
मावस की काली रातो में,
जुगनु सा चमके जाता हूँ!
है अन्धीयारा जो दीप तले,
मै उन्हें प्रकाशित करता हूँ!!
जो खयालात इस जहन में है,
मै शब्द उन्हें दे जाता हूँ!!!
मावास की काली रातो में,
जुगनु सा चमके जाता हूँ!
वसुधा का आन्चल थामे मै,
उपवन मान बढाता हूँ!!
खिल करके कीचड में भी,
मै कमल पुष्प कहलाता हूँ!!!
मावास की काली रातो में,
जुगनु सा चमके जाता हूँ!
?कवि
राजपुत कमलेश ” कमल ”

One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 28/12/2015

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