? कविता ?

? कविता ?
भोर भई जब आन्खे खोली,
मन्द-मन्द मुस्काइ कविता!
कल्पनाओ के कल्प तरू से,
सुनहले अक्शर लाइ कविता!!
हृदय सिन्धु के मन मन्थन से,
अम्रुत रस ले आई कविता!
भोर भई जब आन्खे खोली,
मन्द-मन्द मुस्काइ कविता!!
नभचर के कलरव में जाकर,
छन्द-छन्द बन आई कविता!
शिवालयो के घन्टनाद में,
टन्न-टन्न गोहराइ कविता!!
कर्म योगी के कर्म सफर में,
कर्म राह दिखलाइ कविता!
भोर भई जब आन्खे खोली,
मन्द-मन्द मुस्काइ कविता!!
वसुधा के हरेक हरित त्रुडो में,
शर्मसार इठलाइ कविता!
सरसो की पियरी ओढे यु,
धानी चुनरिया लाइ कविता!!
कोकिला के मधुर स्वरो में,
कुह-कुह कर गायी कविता!
भोर भई जब आन्खे खोली,
मन्द-मन्द मुस्काइ कविता!!
ममता का दुध पिलाने को,
जननी रुप धर आयी कविता!
गजल्कार की गजलो में फिर,
गजल रुप बन आयी कविता!!
भोर भई जब आन्खे खोली,
मन्द-मन्द मुस्काइ कविता!!
पपिहे की प्यास बुझाने को,
वर्शा की बदली लायी कविता!
चन्दन के तरुवर से सार,
वन-उपवन महेकाइ कविता!!
भोर भई जब आन्खे खोली,
मन्द-मन्द मुस्काइ कविता!!
रशिको के पावन हृदय कुन्ड से,
गङाजल भर लायी कविता!!
कलम ने मेरा साथ दिया तो,
पोथी में उभराइ कविता!
भोर भई जब आन्खे खोली,
मन्द-मन्द मुस्काइ कविता!!
कमल-नयन के नाभि बिन्दु से,
“कमल” सङ चली आयी कविता!
हो गई खतम सब मशी कलम की,
पुर्न नही हो पायी कविता!!
भोर भई जब आन्खे खोली,
मन्द-मन्द मुस्काइ कविता!!
?कवि
राजपुत कमलेश “कमल”

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