खबर-ए-खास

माँ तुम काम सब छोड़ो, मैं खबर-ए-खास लाया हूँ;
तुम्हें मंडप सजाना है, बहू मैं दूढ़ लाया हूँ।

तुम तो येही कहती थीं, कोई मिलजायेगी काली सी;
रोटी चार खाने में, देगी आठ गाली सी;
करेगी बात लातों से, मुश्किल कर देगी जीना;
होगा हाथों में बेलन, लगेगी डायन-ए-हसीना;
मगर सच जिसको देखा है, उसकी बात ही क्या है;
दिन की रोशनी है क्या, रात की चांदनी क्या है;
कहोगी क्या नज़ाकत है, वो हुस्न-ए-नूर लाया हूँ;
तुम्हे मंडप सजाना है, बहू मैं दूढ़ लाया हूँ।

जिसके साये में चंदा चमकना भूल जाता है;
जिसको देख कर जुगनू दमकना भूल जाता है;
जिसको लोग धरती पर परी का नाम देते हैं;
जिसके रूप पर तारे अपनी शाम देते हैं;
जिसको देख लेने से मेरा दिल गीत गाता है;
थम जाता है ये पल जब वो नज़रें मिलाता है;
कीमत बेजोड़ है जिसकी,वो कोहीनूर लाया हूँ;
तुम्हे मंडप सजाना है, बहू मैं दूढ़ लाया हूँ।

2 Comments

  1. Bimla Dhillon 26/12/2015
    • अंकुर 26/12/2015

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