वो पहली किरन

वो आई जैसे नीले पर्वतों के पार निकली हो वो पहली किरन
छंट गये सारे अंधेरे दिल के, थम गया वो चंचल यौवन

पी लिया जो मैं था, तुमने उन सुरमई नैनों के प्याले से
सँवार ली छवि अपनी देख कर तेरी नजरों के हवाले से

तेरे अधरों के स्पर्श से बने जो वो बोल शहद से मीठे
तेरे हंसी की बौछार हैं जैसे अमृत के हजार छीके फूटे

ये कैसा जादू है किया तू ने जो चुपके से मुझे छूआ
तितलियों की बारात निकली कोयल लगातार देती दुआ

वो तेरा नूर है जो ढलक रहा है कंवल से मोती बन कर
वो तेरा प्यार है जो सागर तल से निकल रहा उफन उफन कर

उन जुल्फों को न जकड़ो बार बार जो तेरे गालों पर छा रहे हैं
बेकसूर बेचारे वो तो किसी की चाहतों को बस हवा दे रहे हैं

उस ऊंचे मंदिर में बहोत घंटियां बजती होंगी
बलखाती कमर को झटका कर तुम जब चलती होगी

तेरे हुस्न से सारे हो गए इस कदर दिवाने
भूल गए लोग हर गम और सो रहा खुदा भी चादर ताने

One Response

  1. Girija Girija 25/12/2015

Leave a Reply