||अधेड़ उम्र ||

“जीवन के गुजरते हर वक्त के साथ
चिंताओं का मेरी बढ़ना
वक्त ना होता था बचपन में
खेल खेलने को कभी
और आज भी वक्त ना मिलता है
रिश्तों की ओर फिर मुड़ने की
दौलत कमाने को पिसती है जिंदगी
जीवन के इस जद्दोजहद में
किसी का बचपन कहीं मिट जाता है
जब वक्त मिलता है संवारने का उसको
तो खुद वो दौलत कमाने निकल जाता है
वो केशों का बढ़ता श्वेतपन
बढ़ती उम्र को दर्शाता जो
है आवश्यकताएं शेष अभी
ये सोच सुबह फिर उठ जाता हूँ
ना होती पूरी आवश्यकताएं कभी
ये भूल मै एक पल जाता हूँ
जीवन के इन संघर्षों में
हसरतो को खुद की मिटाते जाता हूँ ||”

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