||समय चक्र ||

“कल तक दो रुपये
जो दो हिस्सों में बँट जाते थे
आज उन्ही दो रुपयों को
हथियाने की साजिश होती है
कल तक जान लुटाते थे
जो माँ-बाप कभी हम पर
भारी मालूम पड़ती है
उनकी दो रोटी आज हम पर
भाई,कभी जो जान से प्यारा होता था
आज उपेक्षाओं में जीता है
जान से प्यारी थी जो बहना कभी
सजाये राखी की थाली
आज वो राह तकती है अपनी
होता था कमरा एक छोटा सा कल तक
पर खुशिया बहुत बड़ी उसमे होती थी
बहुत बड़ा है बंगलो आज
फिर भी खुशियों को तरसता है
घमंड ना करो जवानी का
ये तो एक दिन ढल जायेगी
मुठ्ठी में भरे रेत के जैसे
पल भर में फिसल जाएगी
समय ना होता एक सा कभी
हर पल ये बदलता रहता है
जो आप किसी को मिला है
वो कल अपने को मिलता है ||

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