||बीता कल||

“गुजर गए वो दिन फिर भी
याद तेरी क्यों आती है
दर्द का आलम जो बीत गया था
नया उसे कर जाती है
वो पायल की छम-छम तेरी
कानों में अब भी गूंजती है
वो चूड़ियों की खनकार तेरी
अब भी मधुर संगीत सुनाती है
वो आँखों का काजल तेरा
अब भी बहुत सताता है
होठो की मधुर मुस्कान वो तेरी
याद अभी भी आता है
वो यौवन की खुशबु तेरी
जो पुष्पों सा महका करती थी
बहती है अब भी उन फ़िज़ाओं में
जो कल तक सपनों सी होती थी
वो माथे की कुमकुम तेरी
जो सुन्दर तुझे बनाती थी
वो कानों का कुण्डल तेरा
जो श्रृंगार को पूर्ण बनाती थी
है तस्वीर तेरी अब भी जिन्दा इन आखों में
होते है ख्वाब अधूरे अब भी बिन तेरे इन आखों में |”

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