(शायरी )

गिरकर संभल जाऊ मै
बस वो खयालात मेरे हो
इश्क मे मौत भी मंजूर है मुझे
पर जो दे मुझे मरने की सजा
उन कुछ हाथो मे दो हाथ तेरे हो ।
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इजहार-ए-मौहब्बत गुनाह है
तो ये गुनाह मै हर बार करू
कातिलाना है तेरी नजर ए संगदिल
पर तेरा दीदार बार बार करू
गर तेरी बाहों मे बीते दो पल
तो भी तुझपे जान निसार करू ।

कभी छूता ना था शराब को
आज महखाना मेरे नाम रहता है
हँसते हँसाते फिरता था जो
आज वही गुमनाम रहता है
इश्क का नशा तो ऐसी आग है
प्याला पीकर तो संभल जाता है इन्सान
मौहब्बत मे बहकना तो सरेआम होता है ।

वो बादल ही था ऐसा
कि बेखुदी देकर जाना था
इश्क का तूफान उठा ऐसा
के मेरा मकान जलाना था
मौहब्बत की बारिश मे भीगे सारे
बस मेरा आंगन सूखा रह जाना था ।

हुस्न तो बना ही है
जग मे कयामत ढहाने के लिए
मौहब्बत तो होती ही है
जग मे बदनाम कराने के लिए
सपनो की चाह तो इश्क मे ना पड
रस्ते तो मिल ही जाते है
अपने निशाँ बनाने के लिए ।

रोज तन्हाईयो से मेरी गुफ्तगू होती है
तुझे आगोश मे भरने की आरजू होती है
तू प्यार का इजहार तक ना कर सका
तो क्यू तेरी जुबां मेरे किस्से मे मसगुल होती है ।

गुनाह किया जो इजहार-ए-मौहब्बत खुलेआम कर दिया
अपने ह्रदय की वेदना को
सरेआम कर दिया
तू तो कुचलता गया मेरे जज्बातो को
मैंने ये दिल तेरे नाम कर दिया ।

आसूं बहाने से मिल जाता वो मुझको
तो मै मुस्कान मिटा देती
थोडा किया होता इशारा
रिश्ता तो मै ही निभा लेती
उसकी आखें करती थी सिफारिश मौहब्बत की
इजहार करता जो वो मुझसे
तो मै भी जान लूटा देती ।

उन्हे इश्क ना था हमसे
फिर भी मनाया करते थे
मेरी आखो की अक्ष्रू धारा
अपने नैनो से बहाया करते थे
उनकी खुशियो को ना नजर लगे
हम पीते गये गम के प्याले
दर्द तो था जुदाई का बहुत
पर अश्क छिपाया करते थे ।

इश्क ना कर ए दिल
तू बिखर कर रह जायेगा
जीना होगा तुझे घुट कर हर पल
लेकर इम्तेहा तेरी दीवानगी का
वो तुझे तन्हा कर जायेगा ।

One Response

  1. omendra.shukla omendra.shukla 25/12/2015

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