कर्म अधिकार

मुझे समझ नही आता
बढती जाती है उलझन
कटपूतली है जब इन्सां उसकी
तो मिलता क्यू पापो का दण्ड
गर लिखा है सब उसने ही
तो इन्सां पाप क्यो करता है
क्यू अपने स्वार्थ मे भरकर
दूजे का शोषण करता है
भगवान गर कर्म लिखता खुद ही
तो क्यू पाप-पुण्य का दण्ड देता
होते सब उसके अधिकार मे
तो क्यू वो धरा पर जन्म लेता
जीवन चक्र है उसके हाथ
कर्म पर अधिकार हमारा
किस्मत होती होगी जग मे
कर्म लिखे नसीब हमारा
क्यो किस्मत को दोष लगाते
कर्म तुम्हारे ऐसे है
कटपूतली नही इन्सां रब की
वो खुद मालिक के जैसे है
अपने कर्मो का रखो ब्यौरा
एक दिन सफल हो जाओगे
किस्मत को नही दोगे दोष तुम
जो कर्म सही अपनाओगे ।

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