लोगो में वह छोटा वर्ग

कचड़ो का ढ़ेर हैं
चारो तरफ अंधकार
पर जल रही है ज्योति एक
जो फैला रहा है प्रकाश ।

शांत, निरास है दर्द
उसमे एक परिवार का
जो देख रहा है इस समाज में
दूसरों को चलते-फिरते ।

कोई ज्योत होती तो मन उसका
कितना करता आराम, पर
जब दो वक्त की आग सताये
वह फिर से मुरझा जाए ।

है समाज में एक वर्ग
जो चले साथ, पर रहे न रंग
है वह दर्द में जिता
हर पल, हर दम ।

-संदीप कुमार सिंह

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