||नेताजी ||

“ईमान नहीं है खुद का फिर भी
ईमानदारी का ढोंग रचता हूँ
करके धरना और नारेबाजी
जनता को मुर्ख बनाता हूँ ,

भोलीभाली जनता है अपनी
पलभर में इसको बहकाता हूँ
कराके दंगे आपस में इनसे
खुद की दाल पकाता हूँ,

ना साक्ष्य कोई ये मांगे है
जुबानों के पीछे हरदम भागे है
विकास का ढांढस पाके ये
सोते हुए ना फिर जागे है ,

भ्र्ष्टाचार विरोधी हूँ मै
पर भ्रष्ट को गले लगाता हूँ
नाता ना कोई इनसे है मेरा
फिर भी दिल इनसे ही लगाता हूँ ,

मै हूँ नेता राजनीती का
जाति,धरम ना मानु मै
हो सीधा कैसे भी उल्लू अपना
इसीको धरम अपना मानु मै .||

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