कैटवाक

जेठ-दुपहरी चिड़िया रानी
सुना रही है फाग

कैटवाक करती सड़कों पर
पढ़ी-पढ़ाई चिड़िया रानी
उघरी हुई देह से जादू
पल-छिन करती चिड़िया रानी

पॉप धुनों पर गाती रहती
हरदम दीपक राग

बिना परों के उड़ती-फिरती
ताक रहे तारे ललचाए
हाथ जोड़कर कुआँ खड़ा है
पानी लेकर बदरा आए

जब चाहे तब सींचा करती
अपने मन का बाग़

कितने उलझे दृश्य-कथा में
कुछ द्विअर्थी संवादों के
अनजानी मस्ती में खोए
आकर्षण झूठे वादों के

पल भर में बरसाती पानी
पल भर में है आग

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