“यक़ीन” डॉ. मोबीन ख़ान

हर रोज़ ये एतवार क्यों नहीं होता।।
लोगों को हर किसी पर ऐतबार क्यों नहीं होता।।

मंज़िले तो हासिल हो ही ज़ाती हैं लोगों को।।
पर हर किसी का बाँगवां गुलज़ार क्यों नहीं होता।।

क्यों ख़ामोश है ये ज़माना उनकी तवाही पर।
कोई इंसाफ़ के लिए गुहार क्यों नहीं लगाता।।

लुट रही आबरू यहाँ हर रोज़ किसी ना किसी की।
लोगों का क़ाफ़िला क्यों नहीं मदद की खातिर आता।।

हर कोई बैठा है एक दूसरे के भरोसे।
पर खुद क्यों नहीं आवाज़ उठाता।।

बहुत होगा तेरी हस्ती मिट जायेगी।
गुनहगारों के ख़िलाफ़ क्यों नहीं हथियार उठाता।।

मुझे यक़ीन है ख़ुदा पर अपना फ़र्ज़ अदा कर रहा हूँ।
मैं ख़ुश हूँ, भले ही कोई काफ़िला मेरे साथ नहीं चलता।।

मज़ा आता है ज़ब ख़ुद ही मेरी कलम हक़ीक़त लिखती है।
दिल को कभी भी अल्फ़ाज़ों पर एहसान नहीं करना पड़ता।।

दिमाग़ भले ही अपनी गुमान में जिए मोबीन।
पर तेरे दिल को कभी भी इसका एहसान नहीं लेना पड़ता।।

One Response

  1. Tamanna 21/12/2015

Leave a Reply