मंजिल तक

अकेलेपन में
होकर जीवन से निराश हताश
जब भी सोचता हूॅ
क्यो असफल हो जाता हॅू
तब अपने आप से उकताता हूॅ
स्वयं से लड़ता झगड़ता हूॅ
स्वयं की गलतियों व कमजोरियों के लिए
छड़ भर में ही सारी खामियाॅ मिटा लेना चाहता हूॅ
इसी प्रकृया में शूरु होता है
विचारों की प्रकृया
एक ऐसी प्रकृया
जिससे न रास्ता अवरुद्व होता है
न ही रास्ता दिखता है
बीच भॅवर में फॅसाये रखता है
परन्तु तब भी
इतना धैर्य बंधा होता है मन को
कि भंवर में घूम फिर कर
बिलख तड़प कर एक दिन रास्ता मिलेगा
एक दिन अवश्य मिलेगा
जो मंजिल तक सुलभता से जाता है

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