स्कूल का पार्क

दूरियां इतनी है
कि मिल नहीं सकते
बिल्कुल वैसे
जैसे मृत्यु के पश्चात होता है

अपितु तुम इसी जग में हो
और मैं भी इसी जग में
पर कहीं दूर
बहुत दूर
एक दूसरे की पते से
किसी शहर के किसी कोने में
अपने जीवन में मशगूल
उस भूले बिसरे प्रेम पर
मोटी सी पर्त के रुप में
डाले हुए धूल ।

पर कभी कभी
इस धूल को हटाकर
उस प्रेम में झांकी मार ही लेते हैं
जैसे
धूल धूसरित दर्पन को साफ कर
आदमी बार बार दर्पन में
निहारता है मुखमंडल

पता है कि
तुम आ नहीं सकते
मैं तुम तक जा नहीं सकता
क्योंकि वक्त ने मतलबी बना दिया
हम दोंनो को।

कल एक दूसरे की जरुरत थी ,
आज किसी दूसरे से
पूरी होती है जरुरत
हमारी और तुम्हारी प्रेम की ,
व अब
किसी दूसरे की वश में भी तो हैं
हम दोंनो ,
बहुत विचार मंथन के पश्चात भी
इस वश से बाहर नहीं आ सकते ।

हां ये बात जरुर है
पहले की तरह स्कूल की पार्क में
अभिभावकों के भय से मुक्त
निर्बाध मिला करते थे नित
छुपछुप कर अध्यापकों के नजर से
तब घंटों बातें करते
सब दोस्त देखते थे हमें
पर हम आपस में खोए होते
बीच बीच में अठखेलियां भी करते
तुम अपनी पतली कोमल उंगलियों से
जब जब स्पर्श करती
तब एक एक स्पर्श
हृदय की धरातल पर उतर जाती
देह में ऐसे विस्तारित होतीं
जैसे आसमान में बिजली कौंधकर फैलती है
वो स्पर्श बिसरता नहीं है।

अब तो हर बंधन तोड़कर चली आतीं हैं
तुम्हारी वो नन्हीं उंगलियां
मुझे छूने मेरी तनहाइयों में ,
छूतीं हैं देर तक
स्कूल के उसी पार्क में
जहां बैठकर हम दोंने कभी
जीवन के अनमोल वक्त गुजारे थे ।

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