“ग़ुरूर”डॉ. मोबीन ख़ान

ना जाने कितनों को बदलते हुए देखा है।
बसी बसायी बस्तियों को उजड़ते हुए देखा है।।

इंसान तुझे किस बात का रहता है ग़ुरूर।
आफताब को भी शाम को ढलते हुए देखा है।।

2 Comments

  1. asma khan asma khan 20/12/2015
    • Dr. Mobeen Khan Dr. Mobeen Khan 20/12/2015

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