==* जिंदगी एक कश्ती *==

कुछ वक्त के सितमसे हम सिहरसे गये
कुछ यादो मे उनके हम बिखरसे गये

जा धुंड ला पल जो बीते उनके सायेमें
जो देखे थे मैंने सपने सारे तुटसे गये

मौसम था खुशनुमा थी बहारसी सजी
उसी बहार में जिन्दगीके पन्ने झळसे गये

तुटा हुवा है शीशा आजभी उस घरका
जिंदगी की राहो मे हम यु भटकसे गये

कागज़ की कश्ती कुछ डूबी इस तरह
कभी पास थे किनारे अब वो छुटसे गये
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शशिकांत शांडिले(SD), नागपूर
दि.१२/१२/२०१५

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