कागज के इंसान

घूम रहा मन बन आवारा
आकाश लगे सदा प्यारा
खोज रहा अपने बदलाव
भूला नहीं मगर अलगाव,
सैकड़ों राहें बनी मंजिलें
सफर के भी निशां मिलें
कदमों को थामे धड़कनें
कश्मकश है या उलझनें,
अंदाज सिखाये चित्रों ने
संवाद रचते चलचित्रों ने
पंचतंत्र कथा हुई पुरानी
बचपन की नहीं कहानी,
कुछ तो अपना भी छूटा
सुख परायों का जो रुठा
तन संवारने की दौड़ में
मन का दर्पण क्यों टूटा,
बीते कल के किस्से अब
गरम रेत के निशान हुऐ
सपने उड़ते थे जो कभी
पंख बन हवा में अनछुऐ,
अपनत्व बंधुत्व व जीवन
परम्पराओं के साज हुऐ
विकसित ऋणों को भुला
हम कागज के इंसान हुऐ,

…………… कमल जोशी

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 14/12/2015
    • K K JOSHI K K JOSHI 15/12/2015
  2. Manjusha Manjusha 14/12/2015
    • K K JOSHI K K JOSHI 15/12/2015

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