बीत न जाये आयी बहार

बीत न जाये आयी बहार

फूल खिलें हैं गुलशन गुलशन
काँटों की भी है बहार
बस में केवल इतना है
चुने फूल यान काँटों का हार
रंग सुगंध और कोमलता
करे हर दिल को गुलज़ार
जो खेलें कभी काँटों से
हो जाये दामन तार तार
देने वाले ने हमें दिया बहुत
फिर भी गरम नफरतों का बाजार
छोड़ इंसानियत करते हम
तेरे मेरे का व्योपार
पाने2 की रट्ट में कुछ खोया
काटा अंत जो हमने था बोया
दुःख है भारी सुख पर आज
दुखदायी नज़ारों का होता दीदार
खोकर जीवन क्या ढून्ढ रहे हम
गंवाएं सब कुछ व्यर्थ बेकार
है भेद भाव भरा संसार
न माने माटी का उपकार
मिला है जीवन बांटों खुशियां
बीत न जाए आयी बहार
देह मिली मंदिर हो जैसे
विराजे आत्मा अंतर में जैसे
मिला है जीवन,,सुन्दर अत्ति सुन्दर
जी भर जियो बांटो प्यार
लगे न जीवन यूं ही गंवाया
और बीत न जाये आयी बहार

4 Comments

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 14/12/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir 14/12/2015
  3. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 14/12/2015
  4. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 14/12/2015

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