ईमान का ज़िक्र

जब भी उनसे करो ईमान का ज़िक्र,
करने लगते हैं ख़ानदान का ज़िक्र।

हम जो करते हैं अम्न का चर्चा,
छेड़ देते हैं वो तूफ़ान का ज़िक्र।

जब चली बात मुझपे तोहमत की,
तब हुआ मेरे मेह्रबान का ज़िक्र।

बारहा उनसे सुना है हमने,
एक टूटे हुए गुलदान का ज़िक्र।

आके यादें लिपट गयीं मुझसे,
जब छिड़ा माँ के पान-दान का ज़िक्र।

धूप से कर ली दोस्ती हमने,
मत करो हमसे सायबान का ज़िक्र।

गुलशने-दिल उजड़ गया कब का,
क्या करूँ अब बचे निशान का ज़िक्र।
‘सौरभ’…..

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