कहाँ डर रह गया है अब खुदा का

बदल देता है पल में रुख़ हवा का,
है उसकी बात में जादू बला का।

लबों पर है कहाँ मुस्कान बाक़ी,
कहाँ अब गूँजता कोई ठहाका।

वो जिसके पास धन बल-बाहु बल है,
उसी को सिर झुकाता है इलाक़ा।

अगर तुम भी तरक़्की चाहते हो,
तो पहले छोड़ दो दामन वफ़ा का।

बहुत ढूँढे से भी मिलता नहीं अब,
उठाये बोझ जो माता-पिता का।

समय की नब्ज़ जो पहचानता है,
उसी के नाम की फहरे पताका।

फ़क़ीरों से भी होती बद सलूक़ी
कहाँ डर रह गया है अब ख़ुदा का।
‘सौरभ’………

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  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 15/12/2015

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