जिंदगी है क्या

हवा में कुछ नमी है क्या,
गुलों में ताज़गी है क्या।

तू क्यों हैरान है इतना,
हक़ीकत खुल गयी है क्या।

अदावत पर उतर आया,
अदावत लाज़मी है क्या।

नदी को ग़ौर से सुनिए,
नदी कुछ कह रही है क्या।

मुहब्बत करने निकले हो,
मुहब्बत दिल्लगी है क्या।

ख़जाना कर दिया ख़ाली,
यही दरिया दिली है क्या।

तुम्हें अपनालिया हमने,
तो कोई भूल की है क्या।

तू क्या जाने मये-उल्फ़त,
कभी दो घूँट पी है क्या।

जिए अपने लिए केवल,
ये कोई ज़िन्दगी है क्या।

ये अपना है पराया वो,
तिजारत देखती है क्या।
‘सौरभ’……

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