मुक्तक

बरसो बरस पुराने रिश्तो के पावन से वो बंधन
बिछड गई वो गाँव कि गलियाँ मधुर हवायें वो उपवन
सब कुछ तो हम भूल गयें हैं बस इतना सा याद रहा
अब न रही वो नरम कलाई अब न रहे हैं वो कंगन

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir 12/12/2015
  2. नितिश कुमार यादव नितिश कुमार यादव 12/12/2015

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