शराफत ……

देख ली शराफत जमाने इस कि
अब थोड़ी सी गुस्ताखी देख ले !
लगाई आग नफरत की दिलो में
अब उसका अंजाम ऐ हाल देख ले !!

चाहकर भी न बचा सका
अपने जलते हुए आशियाने,
चल चिड़ियों कि तरह फिर
एक घोसला बनाकर देख ले !!

गिराया जाता रहा हर बार
फलक की ऊंचाइयों से अगर
फिर से अपने हौंसलो को
तू पंख लगकर देख ले !!

लुटती रही अपनी हस्ती
सदा इमानदारो के हाथ से,
अब बनकर तू भी बेईमान
थोड़ी शोहरत बटोरकर देख ले !!

जब की नही परवाह आजतक
किसी ने “धर्म” तेरी ज़माने में
चलकर ज़माने की चाल तू भी
अब थोड़ा खुदगर्ज होकर देख ले !!
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<---:: डी. के. निवातियाँ ::--->

7 Comments

  1. Anuj Tiwari "Indwar" 08/12/2015
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 08/12/2015
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 08/12/2015
  2. RAJ KUMAR GUPTA Raj Kumar Gupta 08/12/2015
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 09/12/2015
  3. Shishir "Madhukar" Shishir 08/12/2015
    • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 09/12/2015

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