टाल टाल न टाल मुझे…..(रै कबीर)

टाल टाल न टाल मुझे, न यूँ ही मुझको टाल
है हल्का सा बुखार मुझे ,न यूँ ही मुझको टाल
उम्र का सूरज ढल रहा, बर्फ मेरा वो गल रहा
टाल टाल न टाल मुझे, न यूँ ही मुझको टाल
कल की घटना भूल गया ? जो दिया मुझे यूँ टाल ?
तल नरम है,थल गरम है, तू होगा काल का गाल
टाल टाल न टाल मुझे, न यूँ ही मुझको टाल
हुई जाती बहुत पुरानी , इस पेड़ की छाल
शिकारी दाना डाल चुका , क्यों बुना तूने ये जाल
टाल टाल न टाल मुझे, न यूँ ही मुझको टाल
मत कर एसी चेष्टा , बात न तूँ ये टाल
जिस भुजा पे तू बैठा , है टूट रही वो डाल
टाल टाल न टाल मुझे, न यूँ ही मुझको टाल
तीरों की इस चोट से , कमजोर हुई ये ढाल
मुझे ठण्ड है लग रही , जरा ओढा दो शाल
टाल टाल न टाल मुझे, न यूँ ही मुझको टाल
कितने महीने शेष हैं , है बाकि कितने साल
उधार अभी बाकि है तेरा , उसको न ऐसे टाल
टाल टाल न टाल मुझे, न यूँ ही मुझको टाल
है हल्का सा बुखार मुझे ,न यूँ ही मुझको टाल