छोटी-सी कली

छोटी-सी सुंदर नाजुक कलियाँ
फूलों सी मुसकाती हैं
पर हर रोज वह किसी तरह से
पैरों से कुचली जाती हैं।

बात करूँ मैं उन फूलों की
जो रातों को न सोती है
हर पल, हर दिन डरती हैं
पर हमसे कुछ न कहती हैं।

आँसू आते हैं आंखों में
जब कली कोई भी रोती है
बेदर्दी इस समाज में आज
वनमाली क्यों कोई न होता है।

जब-जब वह हँसती है
बगिया सुंदर हो जाती है
और जब भी वह रोती है
बगिया मुरझा जाती है।

समझे न वह इस दुनिया को
अभी तो कली वह नाजुक है
और नाजुक-सी ही हालत में
रस्ते पर वह घूम रही है।

भीड़ो मे वह गुम हो जाती
आते-जाते ठोकर खाती
तब मुसकाती इन कलियों की
रंगत एक पल में उड़ जाती।

छोटी-सी सुंदर नाजुक कलियाँ
फूलों-सी मुसकाती हैं
पर हर रोज वह किसी तरह से
पैरों से कुचली जाती हैं।

-संदीप कुमार सिंह

4 Comments

  1. RAJ KUMAR GUPTA rajthepoet 07/12/2015
  2. संदीप कुमार सिंह संदीप कुमार सिंह 08/12/2015
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 08/12/2015
  4. संदीप कुमार सिंह sandeep 08/12/2015

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