” रात “(रै कबीर)

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अंधी सी बहरी सी
घनघोर सी है ये रात
अनचाहे पहलू परोसती
अत्याचारों की ढाल है ये रात
हर पीडित की चीख पी जाती
सन्नाटों की रेत सी ये रात
अन्तर्मुखी सा स्वभाव इसका
हैवानों की सखी सी ये रात

One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 08/12/2015

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