मुरझाए कमल (रै कबीर)

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ये मुरझाए कमल तो देखो
होता परिभाषित वक्त ।
इनमें खुदको देख रहा हूँ
और नैन से बहता रक्त ।।
एक समय के थे ये राजा
पर उजड चुका है तख्त ।
तसवीर है मेरी भी ऐसी ही
हर पल हुआ है सख्त ।।