स्वप्न

है विकलता आज उर में और दृग में स्वच्छ पानी ।
याद मुझको आ रही अपने मिलन की वह कहानी ।।

जिंदगी की राह में मुझको अकेली तुम मिली थी ।
संकीर्णतओं के चमन में पुष्प बनकर तुम खिली थी ।।

विछिप्त सा था वेश मेरा और अकेला जा रहा था ।
वेदना से था विमूर्छित किंतु फिर भी गा रहा था ।।

देखकर तुमको कदम सहसा हमारे रुक गये थे ।
होते ही दीदार मुझसे दृग तुम्हारे झुक गये थे ।।

मौन की प्रतिमूर्ति बन तुम सामने मेरे खड़ी थी ।
ज्ञान के आह्वान की यह बड़ी मुश्किल घड़ी थी ।।

देखते पहली नजर मे द्वार दिल के खुल गये थे ।
भटकते निरुद्देश्य पथ पर हम तो अचानक मिल गये थे ।।

फिर जो फूटा बोल मुख से सुधा की बरसात हो गयी ।
अज्ञात प्रेरणा से हो प्रेरित कैसी – कैसी बात हो गयी ।।

रोम – रोम झंकृत हो उठा भाव विह्वल मन हो गया ।
पता नही और क्या–क्या होता हा ! तब तक मेरा स्वप्न खो गय़ा ।।

राज कुमार गुप्ता – “राज“

8 Comments

  1. davendra87 davendra87 06/12/2015
    • RAJ KUMAR GUPTA rajthepoet 07/12/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 07/12/2015
    • RAJ KUMAR GUPTA rajthepoet 07/12/2015
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 07/12/2015
    • RAJ KUMAR GUPTA rajthepoet 07/12/2015
      • डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 08/12/2015
  4. Hiren 09/12/2015

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