दुरी

कभी आवाज़ सुनने को तरसते है
तो कभी उन्हें देखने को तरसते है
ये सोंच के परेशान है इस वक़्त वो क्या करते है
वो खिलते है या हसते है
ये सोंच कर दिल को तसल्ली देते है
लगता है एक लम्हा ही वो साथ देते है
उसी के सहारे जीवन हम बिता देते है
खुश होते है सूरज की पहली किरण जब देखते है
इस किरण ने उन्हें भी छुआ होगा ये सोंचते है
बस सारा दिन कड़ी धुप में खड़े हो जाते है
– काजल / अर्चना

One Response

  1. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 05/12/2015

Leave a Reply