अजनबी की तरह…!!

अबकि हम-तुम मिले गर
तो यूँ ताअरूफ़ हो
जैसे पहले कभी हम
मिले ही नहीं
देख कर तुम मुझे
आगे बढ़ जाओ और
मैं भी बस इक निगाह
करके चलता बनूं
यूं मिले हम किसी दिन
अजनबी की तरह
नज़रें मिल जाए फिर भी
इब्तदा कुछ न हो
इंतहा बस हो ये कि
उम्र भर खुद से हम
अजनबियत का रिश्ता बनाए रहें…!!
(C)परवेज़ ‘ईश्क़ी’

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