मुक्तक

आदमी की आदमी से , सोच कितनी भिन्न है |
आदमी की आत्मा में किसका जीवित जिन्नहै |
आदमी ही आदमी को , आज खाये जा रहा है ,,
देख कर पंकज सभी यह मन हुआ अब खिन्न है |
आदेश कुमार पंकज

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  1. Shishir "Madhukar" Shishir 03/12/2015

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