ग़ज़ल

जानता हर आदमी है कि नश्वर यहाँ संसार |
हर आदमी कि जिन्दगी एक रेत कि दीवार |
जानकर भी सब यहाँ वह ऑंखें मूंदें चल रहा ,
स्वार्थ के वश कर रहा वह झूठ का व्यापार |
मानता था दोस्त उसके, हैं बहुत संसार में ,
एक झोकें में मसक – सम उड़ गये सब यार |
कष्ट आकर जिन्दगी में , है दिखाते आईना,
कर रहा है कौन तुमसे और कितना प्यार |
पहचान लो तुम उन सभी को अब यहाँ ,
मच्छ से आँसू बहायें हैं वही ग़ददार |
साथ तुमने कर लिया है गिरगिटों का ,
पंकज बदलते रंग जो हैं हर समय हर बार |
आदेश कुमार पंकज

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