धुंधुली यादें

धुंधुली यादें

चल बैठ कहीं खोलें पिटारा
टुकड़े धुंधली शाम के
मुठी में बंद सितारा
बचपन में लिपटे झिलमिल कण
धूमिल पड़ा नज़ारा
चल बैठ कहीं खोलें पिटारा
तेरी आँखों में आँसू
मेरी भी तो नम थी
गीली चुन्नी के वे टुकड़े
हमराज़ थी हमारा
चल बैठ कहीं खोलें पिटारा
बदली राहें छूटी आहें
कसमों का वो निवाला
अश्रुधार से धुला हुआ मन
बन गया शिवाला
चल बैठ कहीं खोलें पिटारा

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  1. Sukhmangal Singh sukhmangal singh 04/12/2015

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