सागर किनारे

आओ चलें दूर सागर किनारे
भेद नहीं वहां पानी एक सारे
सूरज की सुनहरी परछाई भी
रेत के घरौंदों पर चादर ताने,
एकान्त का अदभुत यह भाव
अविरल जल के गहरे ठहराव
यदा कदा चट्टानों से टकराव
सरल नहीं जीवन देता सुझाव,
जल ने रची नदी सागर श्रृंखला
बहता जाये ना किसी को छला
जल नगरी में मोहकता भी छाई
सरिताओं की शीतलता मुस्काई,
अनगिनत मोती छुपाये आंचल में
शैवालों के हरितों का बसेरा यहां
बहते जीवाश्मों ने भी मुक्ति पायी
विशालता की वेदना ऋणी सदा।

…………… कमल जोशी

3 Comments

  1. asma khan asma khan 03/12/2015
    • K K JOSHI K K JOSHI 03/12/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir 03/12/2015

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