ख्वाहिशें

ख्वाहिश है , कि हर बच्चा हँसता , खिलखिलाता रहे ,
कि उसकी हँसी, मतलबहीन प्रतियोगिताएँ न छीन लें।

ख्वाहिश है, कि छोटा होता बचपन इतना न हो जाए छोटा ,
कि कंप्यूटर की वर्चुअल दुनिया,उससे उसका पूरा का पूरा बचपन न छीन लें।

ख्वाहिश है कि हर फूल खिलता ,महकता रहे ,
कि शहर का प्रदुषण,उससे उसके रंग चमक और खुशबू न छीन ले।

ख्वाहिश है कि शहर के कंक्रीट जंगल में, कुछ हिस्सा मिट्टी का बच जाए ,
कि हमारा यह शहर हमसे, मिटटी की सोंधी खुशबू ना छीन लें।

ख्वाहिश है कि हर रिश्ता, सिर्फ फेसबुक तक न हो जाए सीमित।
कि समय का अभाव हमसे, हमारा हर रिश्ता न छीन ले।

ख्वाहिश है कि युवां जिंदगी की अंधी दौड़ में, इतना न हो जाए मशगूल,
कि काम का बोझ उससे, जीवन की सारी की सारी खुशियां न छीन ले।

यूँ तो मेरी ऐसी छोटी मोटी ख्वाहिशें हैं बहुत ,
मगर डरती हूँ कि आने वाला कल, मेरी सारी की सारी ख्वाहिशें न छीन ले।

4 Comments

  1. asma khan asma khan 03/12/2015
    • Manjusha Manjusha 03/12/2015
  2. Shishir "Madhukar" Shishir 03/12/2015
    • Manjusha Manjusha 03/12/2015

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