संध्या ढल रही है

संध्या ढल रही है.
सांस रूकती तो है, पर चल रही है.

आँसुओं के आँचल में आनन्, दिनकर छुपा रहा.
आई है वो जाने किस जहां से,अंदाज़ा लगा रहा.
इसके होने को भी तो ये छल रही है.
संध्या ढल रही है.

मेरी आँखों में अँधियारा क्यों कर घर बनाए.
दीपक की एक लौ में जीवन की गति पाए.
घनघोर घटायें बिजली से जल रही हैं.
संध्या ढल रही है.

हर एक जगत में आया है, लेकर अपना भाग.
अपनी-अपनी ढपली सबकी ,अपना-अपना राग.
दुनिया नहीं मानती, देती दखल रही है.
संध्या ढल रही है.

माना मैं हूँ एक, बिखर कर टूट रहा सा रिश्ता.
लेकिन दिल पर मेरे, बाकी है बहुत निशां.
इनकी एक चमक से सौ आहें निकल रही हैं.
संध्या ढल रही है.

बैठे पावन राधा-श्याम, मूरत बन मंदिर में.
जीवन का एक निशान बोले घंटी के स्वर में.
श्रद्धा अटल रहेगी, श्रद्धा अटल रही है.
संध्या ढल रही है.

(आँसुओं का आँचल = समुद्र;अश्रु धारा से निर्मित)

गंगाधर शर्मा ‘हिंदुस्तान’

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