ज़िंदगी…रेत की तरह!!

खिल-खिलाती धूप में,
सरसराती छाँव में ,
लहलहाते , कुम्हलाते ,
हवा के झौंकों से ,
जीवन के कुछ पन्ने ,
मैं आज पलट रहा था ,
चँद कोरे शब्द ,
अर्थ-हीन बातें ,
खत के रूप में तेरे नाम,
लिखी हुई कभी की मुलाकाते,
नाकाम आरजुओं की राख,
उन पन्नों से धुआँ बनके ,
उड़ी , मुड़ी , छिटक गई ,
पकड़ना चाहा तो फिसल गई,
ज़िंदगी भी तो रेत की तरह है,
मुट्ठी में पकड़ो तो
कहीं न कहीं से
फिसल ही जाती है…!!

2 Comments

  1. asma khan asma khan 02/12/2015

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