मैं और प्रकृति

मैं और प्रकृति

संध्या के वक्त
प्रकृति के आंगन में
मैं ओर प्रकृति
बस अकेले दोनों थे।
प्रेम से ओत-प्रोत
मधु में लिपी-पुती
वाणी में मधुरता
वो मेरे सामने थी
अर्धनग्न घुंघट में छिपी
बैठी थी सकुचाये हुये,
मैं ओर प्रकृति
बस अकेले दोनों थे।
मंदिरा के प्यालों सी आंखें
गरम-गरम महकती सांसे
हरे शाल में लिपटी हुई
खिल उठी थी मेरी बांछें
देकर अपने तन की खुषबु
सारे आंगन को महकाये,
मैं ओर प्रकृति
बस अकेले दोनों थे।
-ः0ः-

Leave a Reply