“मुसाफिर”

रस्ते अनजान थे , दूर थी शायद मंज़िले ,
न खबर थी कि वक़्त ने ,लिखे राह मे कितने जलजले ,
हर सुबह अपनी ही धुन मे नयी आस वो लेकर जगा,
एक मुसाफिर ज़िन्दगी की राह में चलने लगा ||

कुछ खुशिया बांटी बाप ने , कुछ याद माँ की लोरियाँ,
आँखों से होती गुफ्तुगू , लफ्ज़ो से थी उसकी दूरिया ,
अपनी मासूमियत को वो, घुटनो के बल लेकर भगा ,
एक मुसाफिर ज़िन्दगी कि राह मे चलने लगा ||

कुछ ऐब सीखे दोस्त से , आँखों में बस्ती इश्क़्क़ीया ,
कुछ मनचले से ख्वाब थे कुछ उनसे बढ़ती नज़दीकियां ,
हम तो समझे प्यार था वो चल दिए देकर दगा ,
एक मुसाफिर ज़िन्दगी की राह में चलने लगा ||

खुद सोच में थी उलझने , जिम्मेदारिओं की बोरिया ,
मेरी उम्र सी बढ़ती रही मेरी हसरतो से दूरिया ,
भूल हुई थोड़ी देर से जाना यहाँ न कोई अपना सगा,
एक मुसाफिर ज़िन्दगी की राह में चलने लगा ||

आईने से दूरी मेरी ,खुदको दूसरो की आँखों में परखा ,
ख़ुशी का जश्न न बनाया , की दुखो पे खूब चर्चा ,
समाज की इन कायदो को पूरा कर कर वो थका ,
एक मुसाफिर ज़िन्दगी की राह में चलने लगा ||

One Response

  1. Gurpreet Singh 19/12/2015

Leave a Reply