जीवन तरंग

मन चिन्ताओं की
थकान मिटाने को
पांव पसारे घर पर
खोया था तन्हाई में
प्रश्न लकीरें सर पर,
आँखे भी बोझिल
छुई मुई सी अलसाई
एकान्त काया अदभुत
भयावह हुई परछाई,
खोया मन उलझन में
कथा पुरानी याद आई
चेतना में अस्थिरता
क्यो मंद मंद मुस्काई,
सांसरिक मोह पाश में
गरजे मेघ दुविधाओं के
विद्युत कम्पन भी चमके
ज्ञान गुण हुऐ अभावों के,
रहस्य कैसा मकड़जाल का
सजाया जीवन चिताओं ने
उमंग बालपन का भी सूना
विस्मृत सार किया गीताओ ने,
बूझ रहा मन प्रति क्षण
धूमिल होगा कब आकर्षण
मानुष को बांटती विधाओं का,
रवि की उज्ज्वल किरणें
थाम रही गर्व हिमालयों का
मधुर तनुज की धार
वृक्षों की शीतल छांव में
परोपकारी बनी प्रकृति
मानव की उकेरी सीमाओं में,
आवश्यकता बन पड़ी तरंग
मानवता को पिरोये एक रंग
निश्छ्ल पल ऐसा क्षणिक
भाव जगाये जो अंग अंग।

…………. कमल जोशी

2 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 02/12/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 02/12/2015

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