“मेरा दर्द”ग़ज़ल डॉ. मोबीन ख़ान

मेरा दर्द जो तुम,
शायद से समझ जाते।।

दिल टूटा था मेरा,
मग़र तुम मज़ाक ना बनाते।
अफ़सोस है मुझे मेरी खतावों का,
पर तुम किसी से मेरी शिकायत ना करते।

मेरा दर्द जो तुम,
शायद से समझ ज़ाते।।

जो तुम कोशिश करते मुझे पाने की,
फिर ये बात ज़माने को क्यू बताते।
मैं तो नादान था कुछ ज़्यादा,
पर तुम अपनी चाहत को छिपाते।

मेरा दर्द जो तुम,
शायद से समझ ज़ाते।।

अब क्यू ग़मगीन हो,
क्यू नहीं हो मुस्कुराते।
मेरी बर्बादी को तुम,
सरेआम क्यू नहीं कहते।

मेरा दर्द जो तुम,
शायद से समझ ज़ाते।।

मैं तनहाँ ही सफ़र जारी रखूँगा,
तुम अपना सफ़र क्यू नहीं ज़ारी रखते।
ये चाँद ही तो मेरा सहारा है,
क्यू तुम चांदनी रात की ख्वाहिश करते।

मेरा दर्द ज़ो तुम,
शायद से समझ ज़ाते।।

3 Comments

  1. Tamanna 02/12/2015
  2. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 02/12/2015
    • Dr. Mobeen Khan Dr. Mobeen Khan 03/12/2015

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