चन्द खुशियों की खातिर…

चन्द खुशियों की खातिर बसाया था जो एक जहान ।
चन्द खुशियों के लिए आज बेच आया हूँ वो मकान ।।

हर एक शै मैं उठा लाया हूँ वैसे तो वहां से ।
छोड़ आया हूँ मगर अपने बचपन के कुछ निशान ।।

ज़िन्दगी भी अब तो यहां बस सेहरा है रेत का ।
बहता था वहां रोज़ खुशियों का आब-ए-रवान ।।

महफ़िलों औ तक़रीबों के चलते थे दौर भी ।
आते थे उस घर में मेरे दोस्त और मेहमान ।।

वो घर नहीं था मेरा बाग़-ए-बहार था ।
यादों में आज भी है उस घर की हर एक शाम ।।

बुज़ुर्गों के साये में मैं मेहफ़ूज़ था वहां ।
वो घर नहीं था ‘आलेख’ था मेरा बागबान ।।

— अमिताभ ‘आलेख’

शै = [ thing, वस्तु ]
आब-ए-रवान = [ running water, spring ]
तक़रीब = [ festival ]

6 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir 02/12/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 02/12/2015
  2. asma khan asma khan 02/12/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 02/12/2015
  3. डी. के. निवातिया निवातियाँ डी. के. 02/12/2015
    • आमिताभ 'आलेख' आमिताभ 'आलेख' 02/12/2015

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