मेरे तेरे में तुही, ये दो तुमसे दूर

मेरे तेरे में तुही, ये दो तुमसे दूर ।
तू मुझमें ना पवता, मैं तुझमें भरपूर ।।

मैं तुझमें भरपूर भूलकर दूर बतावै ।
तू कहता परछिन्न वेद भरपूर लखावै ।।

गंगादास जब मर्म-भर्म दो तज गेरे में ।
नहीं फेर कुछ फर्क समझ मेरे तेरे में ।।

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