ग़ज़ल

सौ झूठे भी मिल जायें पर ,
सच को हरा नहीं सकते |
सौ तारे भी मिल जायें पर ,
तम को भगा नहीं सकते |
चन्द्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण से,
क्या चंदा सूरज मिट जायेंगें |
कुछ देर अनाचारों के वश में ,
धूमिल – हो छिप जायेंगें |
अविरल बहने वाला दरिया ,
रोक नहीं सकते हो तुम |
लाख उपाय करो सागर जल ,
सोख नहीं सकते हो तुम |
बहती मस्त पवन के झोकों ,
का रूख मोड़ नहीं सकते |
टूटे हुए काँच को तुम सब ,
फिर से जोड़ नहीं सकते |
जंगल के तो सभी जानवर ,
झुण्ड बनाकर चलते हैं |
करूँ पराजित सिंह को कैसे ,
वे रोज सभाएं करतें हैं |
याद रखो तूफानों में ,
सख्त वृक्ष गिर जातें हैं |
सहनशील और नम्र यहाँ जो ,
केवल वे बच जातें हैं |
बस्ती में आग लगाकर के ,
क्या तुम अब बच जाओगे |
कूड़ा- करकट के ढेर सदृश ,
धूं – धूं कर जल जाओगे |
समय बचा है अब भी चेतो ,
अपने पर विश्वास करो |
गलत राय पंकज जो देते ,
उनको अपने से दूर करो |
आदेश कुमार पंकज

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  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 30/11/2015

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